पुलिस हिरासत से 8 महीने बाद छोड़ा गया मुर्गा, इसलिए किया गया था बंद


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आपको बता दें, पाकिस्तान में मुर्गों की लड़ाई को अपराध बताया गया है। इस बात के लिए एक साल तक की कैद या 500 रुपये का जुर्माना भी लग सकता है। कुछ महीने पहले मुर्गों को लगभग दो दर्जन लोगों के साथ हिरासत में लिया था। सभी अभियुक्त तो जमानत पर छूट गए थे। मगर मुर्गे केस प्रोपर्टी की हैसियत से पुलिस के पास ही रह गए क्योंकि उनके मालिकाना हक की दावेदारी किसी ने नहीं की थी। ऐसे में जब तक अदालत मुर्गों पर कोई निर्णय नहीं सुनाती, तब तक उनकी खैरियत रखना थाने की जिम्मेदारी थी।

इस मामले पर बीते दिनों घोटकी के स्थानीय निवासी जफर मीरानी ने सिविल जज की अदालत में अपील की कि पुलिस की हिरासत में रह रहे मुर्गे को उन्हें दे दिया जाए, जिसके बाद अदालत ने पुलिस को मुर्गे को रिहा करके उसके मालिक के हवाले करने का आदेश दिया गया है। अपीलकर्ता ने दलील दी किसी काम से वो कराची में थे, इसलिए मुर्गे के मालिक होने का दावा नहीं कर पाए थे। पुलिस ने मुर्गों को लॉकअप या बाड़े की बजाय खुले स्थान में रखा। मगर उनकी एक टांग रस्सी से बांधकर रखी गई थी।

उनका पेट भरने के लिए पुलिस को अपनी जेब से प्रतिदिन लगभग 100 रुपये का बाजरा भी लाना पड़ा। मुर्गों के बीमार पड़ने की सूरत में उन्हें लाइवस्टॉक विभाग के डॉक्टर को भी दिखाया जाता है। इसके साथ ही, उन्हें बिल्ली और कुत्तों से बचाना भी पुलिस की ड्यूटी बन गई क्योंकि मुर्गों को कुछ होने का मतलब अदालत की नाराजगी का मोल लेना था।


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vikas

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